Mirza Ghalib Love Shayari
कभी नज़्मों में, कभी ख़तों में, कभी अधूरी ख़्वाहिशों में… Mirza Ghalib Love Shayari हमेशा दिल को छू जाती है। पता है, ग़ालिब की शायरी पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई हमारे ही दिल की बातें कह रहा हो। जैसे हमारी अधूरी मोहब्बत, हमारा टूटा हुआ विश्वास, और हमारी तन्हाई उनकी कलम से निकलकर अल्फ़ाज़ बन गई हो।
मैं जब पहली बार ग़ालिब को पढ़ी थी न, तो लगा कि प्यार का असली चेहरा तो वही है जो दर्द में छिपा होता है। ग़ालिब कहते हैं – “इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।” और सच मानो, यही इश्क़ है। वो तुम्हें पूरा भी करता है और तोड़ भी देता है। उनकी शायरी में हर लफ़्ज़ दिल से टपका हुआ लगता है, जैसे किसी ने अपना खून शब्दों में मिला दिया हो।
ग़ालिब की मोहब्बत भरी शायरी जो दिल को छू जाए
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे
अरमान लेकिन फिर भी कम निकले। ज़िंदगी से यही शिकवा है हर पल,
कि जो मिला नहीं वो ही सबसे ज्यादा पसंद निकले।
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार, या इलाही ये माजरा क्या है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल, जब आँख ही से न टपका तो
फिर लहू क्या है। इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब,
जो लगाए न लगे और बुझाए न बने।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
न सुनो गर बुरा कहे कोई, न कहो गर बुरा करे कोई
रोक लो गर ग़लत चले कोई, बख़्श दो गर ख़ता करे कोई।
क़रासिद के आते-आते ख़त इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में।
कोई दिन गर ज़िंदगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है
जिस शाम मेरे लब पर तेरा नाम न आये, खुदा करे ऐसी शाम न आये,
ऐ–जाने-वफ़ा, ये कभी मुमकिन ही नहीं, अफ़साना लिखूं और तेरा नाम न आये।
आतिश -ऐ -दोज़ख में ये गर्मी कहाँ
सोज़-ऐ -गम है निहानी और है
काटे नहीं कटते हैं लम्हे इंतज़ार के, नज़रें जमा के बैठे हैं रस्ते पे यार के,
दिल ने कहा देखें जो जलवे हुस्न-ऐ-यार के, लाया है कौन इनको, फलक से उतार के।
बारह देखीं हैं उन की रंजिशें ,
पर कुछ अब के सरगिरानी और है
मस्त नज़रों से देख लेना था, अगर तमन्ना थी आज़माने की,
हम तो बे-हुस्त यों ही हो जाते, क्या ज़रुरत थी मुस्कुराने की।
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी, जैसी अब है तेरी महफ़िल
कभी ऐसी तो न थी, ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्र-ओ-क़रार,
बे-क़रारी तुझे ऐ-दिल कभी ऐसी तो न थी।
चेहरे पे हसीं छा जाती है, आँखों मैं सुरूर आ जाता है,
जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे ग़ुरूर आ जाता है।
सच्चे प्यार पर मिर्ज़ा ग़ालिब के लफ़्ज़
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।
हर रज में ख़ुशी की थी उम्मीद बरक़रार,
तुम मुसकरा दिए मेरे ज़माने बन गए।
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक,
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है, वो हर इक
बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता। हमको मालूम है जन्नत
की हक़ीक़त लेकिन, दिल के बहलाने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।
देके खत मुँह देखता है नामाबर ,
कुछ तो पैगाम -ऐ -ज़बानी और है
हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलायें सब तमाम ,
एक मर्ग -ऐ -नागहानी और है .
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझको
होने ने,न होता मैं तो क्या होता। ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार
होता, अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
फिर उसी बेवफा पे मरते हैं ,फिर वही ज़िन्दगी हमारी है .!
बेखुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’,कुछ तो है जिस की पर्दादारी है ..!!
दिल सी चीज़ है, देने को है दे दें, मगर कोई क़ाबिल भी तो हो,
हम तो जान दे के भी खुश हैं, मगर कोई क़ातिल भी तो हो।
इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।
हर वक्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे, तू भी कभी सोच, तुझमें भी कोई ग़म होगा।
खुदा जब हुस्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है,
कदम चुन-चुन कर रखती हो, कमर बल खा ही जाती है।
देखा जिधर यह पाया, आलम हिजाब का, जाली को नाम दे दिया, हमने नक़ाब का,
दुःख की तबश है, धड़कनें तनहाइयाँ भी हैं, यह ज़िन्दगी है जैसे, दिन हो हिसाब का।
तन्हाई में पढ़ने लायक ग़ालिब की शायरी
दिल-ए-नादान तुझे हुआ क्या है,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन, बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
जो तुझ बिन नहीं जी सकते, हम वो लोग हैं जो मर के भी तेरे नहीं हो पाए।
ये ना थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,
मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ।
हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन, ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर
होने तक। दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यों।
ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं,
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।
वफ़ा के नाम पे खुद को मिटा दिया हमने, ग़ालिब के अशआर में जी लिया हमने।
तेरा ज़िक्र जब भी किया, हर मिसरे में खुद को पा लिया हमने।
शहरे वफ़ा में धूप का साथी नहीं कोई,
सूरज सरो पर आया तो साये भी घट गए।
गुनाह करके कहाँ जाओगे ग़ालिब,
ये जमीं और आसमां सब उसी का है।
तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा !
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख !!
ऐ बुरे वक़्त ज़रा अदब से पेश आ ,
क्यूंकि वक़्त नहीं लगता वक़्त बदलने में …
ज़िन्दगी उसकी जिस की मौत पे ज़माना अफ़सोस करे ग़ालिब ,
यूँ तो हर शक्श आता हैं इस दुनिया में मरने कि लिए ..!!
टूटा दिल और ग़ालिब की शायरी का रिश्ता
रंज से ख़ूगर हुआ इंसान तो मिट जाता है रंज,
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आए क्यूँ,
रोएंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यूँ।
हाथ कंगन को आरसी क्या है,
सच कहो तो मुँह पे आती है।
इश्क़ की सज़ा भी मिली और तमाशा भी हुआ, ग़ालिब के शेरों में हर दर्द बयाँ हुआ।
जिसे पाया नहीं हमने उम्र भर, उसी का नाम हर साँस में समा गया।
क़ासिद के आते-आते खत इक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में।
ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर .!
या वह जगह बता जहाँ खुदा नहीं .. !!
दर्द जब कलम से निकला ग़ालिब की तरह, हर अल्फ़ाज़ एक ज़ख्म बन गया।
जिसे लोग महज़ शायरी कहते हैं, वो मेरी ज़िंदगी की दास्तान बन गया।
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
इस सादगी पर कौन ना मर जाये..!!
लड़ते है और हाथ में तलवार भी नहीं..!!
ग़ालिब के अशआर दिल को छू जाते हैं, हर लफ़्ज़ में जैसे कोई आईना दिखाते हैं।
ये शायरी नहीं महज़ अल्फ़ाज़ हैं, जिनमें हम अपना गुज़रा वक़्त पाते हैं।
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता,
तुम न होते न सही जिक्र तुम्हारा होता।
गुज़रे हुए लम्हों को मैं इक बार तो जी लूँ,
कुछ ख़्वाब तेरी याद दिलाने के लिए है।
चेहरे पर बनावट का गुस्सा, आँखों से छलकता प्यार भी है,
इस शौक़-ए-अदा को क्या कहिये, इंकार भी है इक़रार भी है।
क़र्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,
रग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।
उनके देखे जो आ जाती है रौनक..!
वो समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है ..!!
Main Zoya hoon… पिछली बार मैंने “Husband Pillu Love Shayari Marathi” लिखी थी, और अब ग़ालिब के दर्द को लेकर आई हूँ। कभी लगता है, अगर ग़ालिब न होते तो मोहब्बत इतनी शिद्दत से समझी ही न जाती। उनकी शायरी हर उस दिल के लिए है जिसने प्यार किया है, खोया है, और फिर भी मोहब्बत पर यक़ीन रखा है।

